आंदोलन का अधिकार है, लेकिन असभ्यता का नहीं! – अधिवक्ता राकेश पाल

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मसूरी वन प्रभाग की ओर से सभी प्रदेशवासियों को हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

वन अग्नि सुरक्षा अभियान

वन क्षेत्राधिकार एवं समस्त स्टाफ, ऋषिकेश वन क्षेत्र_ऋषिकेश, देहरादून वन प्रभाग की ओर से वनाग्नि रोकथाम को लेकर संबंधित अपील द्वारा जारी की गई चेतावनी।

वन अग्नि सुरक्षा अभियान

वन विभाग रायपुर रेंज की ओर से जंगलों में लगने वाली आग को लेकर जारी की गई अपील।

वन विभाग रायपुर रेंज चेतावनी

जंगलों की आग को लेकर वन प्रभाग मसूरी द्वारा जारी की गई चेतावनी।

अपर यमुना वन प्रभाग चेतावनी

जंगलों की आग को लेकर प्रभागीय वनाधिकारी, अपर यमुना वन प्रभाग, बड़कोट द्वारा जारी की गई चेतावनी।

वनों को अग्नि से सुरक्षा

वनों को अग्नि से सुरक्षा हेतु कार्यालय प्रभागीय वनाधिकारी, बद्रीनाथ वन विभाग, गोपेश्वर द्वारा जारी की गई चेतावनी।

वन अग्नि सुरक्षा अभियान
वन विभाग अपील
जंगलों में आग को लेकर चेतावनी
जंगलों की आग रोकथाम
वन विभाग संदेश

देहरादून।

अधिवक्ता राकेश पाल ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर अभद्र भाषा, हिंसा और अमर्यादित व्यवहार किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अन्याय के खिलाफ आवाज़ अवश्य उठाएँ, लेकिन अपनी भाषा, संस्कृति और चरित्र की गरिमा बनाए रखें, क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के संस्कार और अनुशासन से तय होता है।

मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरा यह लेख किसी आंदोलन के विरोध में नहीं है। लोकतंत्र में अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। यदि व्यवस्था गलत है तो उसका विरोध भी होना चाहिए।

लेकिन जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान जिस प्रकार गाली-गलौज, अभद्र भाषा, तोड़फोड़ और अमर्यादित आचरण सामने आया, उसने मन को अत्यंत पीड़ा पहुँचाई। किसी भी उद्देश्य की पवित्रता उस समय समाप्त होने लगती है, जब उसके साधन मर्यादा खो देते हैं।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि आज का युवा क्या सीख रहा है? यदि आंदोलन के नाम पर असभ्यता, उग्रता और अनुशासनहीनता को “क्रांति” बताकर महिमामंडित किया जाएगा, तो कल यही प्रवृत्ति समाज का नेतृत्व करेगी। ऐसे नेतृत्व से समाज का निर्माण नहीं, बल्कि नैतिक पतन होगा।

भारत की संस्कृति हमें सिखाती है कि संघर्ष करो, परंतु चरित्र मत खोओ; अन्याय का विरोध करो, परंतु अपनी भाषा और व्यवहार की गरिमा बनाए रखो। महापुरुषों ने हमें सिखाया कि परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार संयम, सत्य और सदाचार है, न कि गालियाँ और हिंसा।

यदि हम आज ऐसे अमर्यादित आचरण पर मौन रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ी इसे ही सामान्य मान लेगी। इसलिए आंदोलन का समर्थन या विरोध अलग विषय है, लेकिन असभ्य और अमर्यादित व्यवहार की निंदा करना प्रत्येक जागरूक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है।

युवाओं से मेरा विनम्र आग्रह है—आंदोलन कीजिए, प्रश्न पूछिए, अन्याय का विरोध कीजिए, लेकिन अपने चरित्र, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को कभी मत छोड़िए।

क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल आंदोलनों से नहीं, बल्कि उसके युवाओं के चरित्र से तय होता है।

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