मसूरी वन प्रभाग की ओर से सभी प्रदेशवासियों को हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
वन क्षेत्राधिकार एवं समस्त स्टाफ, ऋषिकेश वन क्षेत्र_ऋषिकेश, देहरादून वन प्रभाग की ओर से वनाग्नि रोकथाम को लेकर संबंधित अपील द्वारा जारी की गई चेतावनी।
वन विभाग रायपुर रेंज की ओर से जंगलों में लगने वाली आग को लेकर जारी की गई अपील।
जंगलों की आग को लेकर वन प्रभाग मसूरी द्वारा जारी की गई चेतावनी।
जंगलों की आग को लेकर प्रभागीय वनाधिकारी, अपर यमुना वन प्रभाग, बड़कोट द्वारा जारी की गई चेतावनी।
वनों को अग्नि से सुरक्षा हेतु कार्यालय प्रभागीय वनाधिकारी, बद्रीनाथ वन विभाग, गोपेश्वर द्वारा जारी की गई चेतावनी।
सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद ध्वस्तीकरण मामले में नया मोड़
100 साल पुराने राजस्व रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग, खसरा-खतौनी से लेकर फसली अभिलेखों तक उठे सवाल
सहारनपुर, 5 सितंबर 2026
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के ध्वस्तीकरण का मामला अब एक नए दस्तावेजी और कानूनी मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। प्रशासनिक कार्रवाई के बाद उठे सवालों के बीच अब मस्जिद की भूमि से जुड़े पुराने राजस्व अभिलेख सार्वजनिक करने की मांग सामने आई है।
भारतीय अधिवक्ता सुरक्षा एवं अधिकार परिषद के राष्ट्रीय सचिव एडवोकेट साजिद मलिक ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, सहारनपुर को पत्र भेजकर खसरा, खतौनी, नक्शा और पुराने फसली अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।
खसरा नंबर 539 की जमीन का इतिहास क्या है?
एडवोकेट साजिद मलिक का कहना है कि प्रशासन की ओर से संबंधित भूमि को सरकारी भूमि बताया गया है और नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय के 16 जुलाई 2026 के आदेश के अनुपालन में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई।
हालांकि, उनका सवाल है कि जिस भूमि पर मस्जिद स्थित थी, उसका ऐतिहासिक और राजस्व रिकॉर्ड क्या कहता है?
इसी को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने प्रशासन से खसरा नंबर 539 से जुड़े पुराने राजस्व अभिलेख सामने रखने की मांग की है।
पत्र में यह भी पूछा गया है कि मस्जिद का निर्माण किस वर्ष हुआ था, निर्माण के समय संबंधित भूमि किसके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज थी और उस समय जमीन की प्रकृति क्या दर्ज थी।
1359 से 1427 फसली तक के रिकॉर्ड की मांग
मामले में सबसे महत्वपूर्ण मांग पुराने राजस्व अभिलेखों को लेकर है। पत्र के माध्यम से 1359 फसली से लेकर 1427 फसली तक के अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
इसके अलावा—
खसरा रिकॉर्ड
खतौनी
राजस्व नक्शा
फसली अभिलेख
भूमि के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज
कब्जे अथवा उपयोग में हुए बदलावों का रिकॉर्ड
सार्वजनिक किए जाने की मांग की गई है।
मांग यह भी है कि यदि भूमि सरकारी थी, तो सरकारी अभिलेखों में उसका दर्ज नाम, श्रेणी और प्रकृति स्पष्ट की जाए। साथ ही यह भी सामने लाया जाए कि पुराने राजस्व या सरकारी दस्तावेजों में उस स्थान पर मस्जिद अथवा किसी अन्य धार्मिक स्थल का कोई उल्लेख दर्ज है या नहीं।
ध्वस्तीकरण के आधार वाले दस्तावेज भी सार्वजनिक करने की मांग।
एडवोकेट साजिद मलिक ने यह भी मांग उठाई है कि मस्जिद को अवैध निर्माण या अतिक्रमण मानने के लिए प्रशासन द्वारा जिन दस्तावेजों और रिकॉर्ड को आधार बनाया गया, उन्हें भी सार्वजनिक किया जाए।
उनका कहना है कि निर्माण से लेकर वर्तमान समय तक भूमि के स्वामित्व, कब्जे और उपयोग में यदि कोई बदलाव हुआ है, तो उसका पूरा रिकॉर्ड सामने आना चाहिए।
उनके अनुसार, पुराने दस्तावेज सार्वजनिक होने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि भूमि की वास्तविक स्थिति क्या थी और प्रशासनिक कार्रवाई किन रिकॉर्डों के आधार पर की गई।
कोर्ट में चल रही कानूनी प्रक्रिया का भी उल्लेख
इस प्रकरण में जिला जज कोर्ट, सहारनपुर में प्रकीर्ण अपील संख्या 108/2026 का भी उल्लेख सामने आया है। संबंधित पक्ष की ओर से वक्फ संख्या 451 और Places of Worship Act का हवाला दिए जाने की बात कही गई है।
हालांकि, इन कानूनी प्रावधानों की व्याख्या और इस मामले में उनकी वास्तविक लागू होने की स्थिति का अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है।
अब प्रशासन के जवाब पर नजर
मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद पहले से संवेदनशील यह मामला अब पुराने राजस्व रिकॉर्ड की मांग के चलते एक नए दस्तावेजी और कानूनी विमर्श में प्रवेश कर गया है।
अब बड़ा सवाल यह है कि—
क्या प्रशासन खसरा नंबर 539 से जुड़े पुराने रिकॉर्ड सार्वजनिक करेगा?
क्या 1359 फसली से 1427 फसली तक के अभिलेख भूमि के इतिहास और स्वामित्व की स्थिति स्पष्ट करेंगे?
क्या पुराने सरकारी दस्तावेजों में मस्जिद या किसी धार्मिक स्थल का उल्लेख मिलता है?और सबसे अहम सवाल—
मस्जिद के निर्माण वर्ष तथा भूमि की प्रकृति से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज क्या कहते हैं?
इन सवालों के जवाब अब प्रशासनिक रिकॉर्ड और प्रमाणित दस्तावेजों से ही सामने आ सकते हैं।
एडवोकेट साजिद मलिक की ओर से कहा गया है कि रिकॉर्ड सार्वजनिक कराने का उद्देश्य विवाद को बढ़ाना नहीं, बल्कि पारदर्शिता, निष्पक्षता और दस्तावेजों के आधार पर वास्तविक स्थिति सामने लाना है।
फिलहाल, पूरे मामले में प्रशासन और पुलिस की ओर से इस पत्र पर क्या जवाब दिया जाता है, इस पर नजर बनी हुई है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि संवेदनशील मामले में सोशल मीडिया पर चल रहे दावों के बजाय न्यायालयीन आदेश, सरकारी रिकॉर्ड और प्रमाणित दस्तावेजों को ही तथ्य का आधार माना जाना चाहिए।
